ग्राम मोर – चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्मस्थान (लघु शोध)
ग्राम मोर – चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्मस्थान (लघु शोध)
पटना से लगभग ८५ किलोमीटर पूर्व में ईस्ट इन्डियन रेलवे पर एक स्टेशन है – मोर. यह मोकामा प्रखंड के अंतर्गत एक गांव है जो ऐतिहासिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है. गंगा नदी के तट पर अवस्थित यह ग्राम भारतीय इतिहास की अनेक सच्चाइयों को अपने अंक में समेटे है. यहाँ प्राचीन टील्हे बहुत बड़ी संख्या में पाए जाते हैं. बौद्ध और ब्राह्मण धर्म – चिन्ह यहाँ बड़ी संख्या में मिले हैं. पीपल के वृक्षों की संख्यां भी यहाँ सर्वाधिक है. संभवतः यही मोरिय क्षत्रियों का नगर था जो वर्तमान में “मोर” के नाम से प्रसिद्द है.
भारतीय इतिहास में चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम बड़ी उपलब्धि है. वह भारत का प्रथम महान ऐतिहासिक सम्राट था जिसके नेतृत्व में चक्रवर्ती आदर्श को वास्तविक स्वरूप प्रदान किया गया. उसने भारत वर्ष में यवनों के विदेशी शासन को तहस नहस कर दिया एवं तत्कालीन मगध साम्राज्य को नन्द के अत्याचार से मुक्त कराया. मेरा मानना है कि चन्द्रगुप्त मौर्य की जन्म भूमि वर्तमान के मोर ग्राम ही है. इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि चन्द्रगुप्त मौर्य मुरा पुत्र होने के कारन मौर्य कहलाया.
ये “मोरिय” कपिलवस्तु के शाक्यों की ही एक शाखा थे . जिस समय कोशल नरेश विडूडभ ने कपिल वस्तु पर आक्रमण किया, शाक्य परिवार के कुछ लोग कोशल नरेश के अत्याचारों से बचने के लिए गंगा के मैदानी भागों की और रुख किया और एक सुरखित स्थान पर बस गए. यह स्थान मोरों के लिए प्रसिद्द था अतः यहाँ के निवासी मोरिय कहे गए.
बौद्ध-ग्रन्थ “महाबंसो“ के अनुसार मोरिय खत्तियों (मौर्य क्षत्रियों) का एक गण पिप्पलिवन प्रदेश में अवस्थित था और चन्द्रगुप्त इस गण के राजा का पुत्र था. संभावना यही लगती है की मगध साम्राज्य का शासक नन्द ने पिप्पलिवन के मोरिय नगर (वर्तमान में मोर गांव) को ध्वस्त किया हो और मुरा (चन्द्रगुप्त मौर्य की माँ) अपने पति के मारे जाने अथवा बंदी बन जाने पर अपने नवजात पुत्र को लेकर कहीं छुप गई हो .
मोरियानाम खात्तियानाम वंसे जातं सिरीधरं
चंद्रगुप्तोती पयाचातनं चणक्को ब्राह्मणों ततो .
नवम धननन्ददन्तं घतेत्वा चंडकोघसा
सकले जम्बुद्वीपअन्हि रज्ज सम्भिसिंचिसो ..
महापरिनिब्बान सुत्त में मौयों को पिप्पलिवन का शासक तथा क्षत्रिय वंश का कहा गया है. उल्लेख है की बुद्ध के निर्वाण पर पिप्पलिवन के मोरियों ने कुशीनारा के मल्लों के पास अपने राजदूत को भेजकर भगवान के अस्थियों के एक अंश की मांग की थी. इसमें कोई शक नहीं की उस वक्त के मोर वासी बौद्ध धर्म के प्रति भी अपार श्रद्धा रखते थे.
जैन साहित्य के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि भगवान् महावीर के ग्यारह गन्धर्वों में से एक था मोरिय – सन्निवेश का कश्यप गोत्रीय मोरिय पुत्र. आज भी वर्तमान मोर के निवासियों का गोत्र “कश्यप” ही है.
हेम चन्द्र के परिशि�����्टपर्वन एवं आवश्यक सूत्र की हरिभाद्रिया टीका के अनुसार चन्द्रगुप्त को मयूर पोशकों के ग्राम के मुखिया के कुल में उत्पन्न कहा गया है .
फलतः विभिन्न ग्रंथों के अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि वर्तमान मोर ग्राम ही चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म स्थल है.
आगे इसपर और भी चर्चा होगी . आपके विचार आमंत्रित हैं …
संदर्भ – ग्रन्थ
१. प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति – के. सी. श्रीवास्तव
२. विष्णुगुप्त चाणक्य – वीरेंदर कुमार गुप्त , राज कमल प्रकाशन
३. मुद्रा राक्षस – विशाख दत्त
४. महावंश , गेगर का अनुवाद , पृष्ठ २७
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